Thursday, 22 December 2016

I'm not a loser!

I’m not a loser!
                                                    -    Suryakant Verma
I walked across a tight-lipped river
I wonder it wouldn't gaze upon
That  so-called smear of loser
My dumbness was wearing on!
The clattering voice of branches
The dawn chorus of crane
Even babbling of the water
Evoked laughing like a drain.

I lose, lost ,I 'm a loser
I myself can't explain
Might it would pint-sized for them
But it was an intense pain.


I raged rashly,
On mirrors of the god,
Out of blue they answered me
With hastily looped applaud!
I sensed what they barbed
I knew there's a chase,
I didn't lose the game that day
I just found the winner of the race!

Monday, 19 December 2016

राम अकेला है।- गीत (संजय कुमार शांडिल्य कि कलम से)


संजय कुमार शांडिल्य एक कवि के साथ एक अच्छे शिक्षक भी हैं। जरूर पढे उनकी कविता संग्रह " अवाज भी देह हैं।"



राम अकेला है।

रावण के परिजन-पुरजन हैं राम अकेला है
उलझन रहित उधर रावण की युद्ध-पिपासा है
इधर झमेले बहुत , पराजय और निराशा है
पतलूनों की फटी जेब में नहीं अधेला है
सोने की लंका में युद्ध अवसर है उत्सव का
इधर अभाव-अवध हेतू है रोज पराभव का
उधर शाम की छाँव,दिवस का इधर घमेला है
वरदानों का रावण मद में चूर विलासी है
विवश राम बैठा पूजन शक्ति अभिलाषी है
पोर-पोर में गाँठ धनुष का, पग-पग ठेला है।

संजय कुमार शांडिल्य
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Thursday, 15 December 2016

कदम जो डगमगाते हैं संभल भी जाते हैं।(कविता) संजय कुमार शांडिल्य कि कलम से।



संजय कुमार शांडिल्य सर अभी सैनिक स्कूल गोपालगंज में शिक्षक हैं।
हाल में हि आया उनका  किताब प्रकाशित हुआ है।

“आवाज़ भी देह है”  



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1.
कश्ती है तलातुम में कोई नाख़ुदा नहीं
मुझको यकीन हो न हो कोई ख़ुदा नहीं
मैं चाहता हूँ ज़ज्ब हो मुझमें तमाम रात
अब सुब्ह पर हमारा कोई मर्तबा नहीं
वो मेरा कुछ नहीं है जो कहता है रातदिन
वो है वफ़ा का देवता, वो बेवफ़ा नहीं
बस लौटती है मेरी ही आवाज़ ए बेबसी
जो आहटें हैं चीख है कोई सदा नहीं
बुलबुल क़फस क़फस है कोई आशियाँ नहीं
तुम अब हो जिस मुकाम पर वो गुलसिताँ नहीं।

संजय

2.
कदम जो डगमगाते हैं संभल भी जाते हैं
ऊबने वाले सुनो हो बहल भी जाते हैं ।
जो रंग खूब जमी महफिलें सजाते हैं
दो बूंद आब पड़े तो बदल भी जाते हैं ।
जो खैंक गड़ते हैं ऊँगली की पोर में बारहा
जरा सी सूई से पल में निकल भी जाते हैं ।
अभी तो ताज़ा है ये ज़ख्म इसका मरहम है
फ़ानी ए वक्त में ज़खमेकुहन भी जाते हैं ।
संजय


Tuesday, 13 December 2016

It's all about idea and success!! By Arpit. Must Read!!!

“It's all about idea and success”

Dodder is a dynamic partner for your story and creativity to the world. This piece of story he talk about Dream of Døddër as social Enterprise.


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Today I am writing what can be DODDER next move in coming months or year.
Don't worry I just say it's all about idea and success for Dodder but in this journey we'll be grateful to you for your support.

My First Action:
Captain of our own ship

Our representation may be of handful group of people with a Different mindset then Traditional, Crazy but Passionate and rebel to break down existing barriers which restrict innovation and Action.

We value individual as one and one will form chain of million.

Though Dodder still in transformation age and lot to achieve but I have proud of the fact that I started yesterday to buy share of Success tomorrow.
Looking back on first day, we started our day one work with Published Authors as contributor and few Readers but still to turn page of those diary which still have something called creative writing via our coming Journal first ever from Senior Secondary Students under Mentorship of Our Dear Teacher.

Truly became your writing Partner!

My Second Dream

As Dodder designed to became social enterprise of its own kind to provide training to individual in Journalism in daily life to encourage candid talk and action to solve problem. We are on mission to designed platform for Dreamers and leaders.

I know to be a ship captain is not day or so activity but with everyday I am grooming my intelligence and nourishing my mind .

At DODDER with each passing day we think of Dream and action but after all it’s all about idea and success.

We request your support to became top of ladder .

Arpit

Sunday, 11 December 2016

औपनिवेशिक बिहार में शिक्षक : एक बानगी By राजू रंजन प्रसाद

 
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राजू रंजन प्रसाद ने प्राचीन भारत में प्रभुत्त्व की खोज: ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के विशेष संदर्भ में’ (1000 ई. पू. से 200 ई. तक) विषय पर शोधकार्य हेतु सन् 2002-04 के लिए आइ. सी. एच. आर का जूनियर रिसर्च फेलोशिप। मई, 2006 में शोधोपाधि। पांच अंकों तक ‘प्रति औपनिवेशिक लेखन’ की अनियतकालीन पत्रिका ‘लोक दायरा’ का संपादन। सोसायटी फॉर पीजेण्ट स्टडीज, पटना एवं सोसायटी फॉर रीजनल स्टडीज, पटना का कार्यकारिणी सदस्य। सम्प्रति मत-मतांतर, यादें, पुनर्पाठ आदि ब्लौगों का संचालन एवं नियमित लेखन।

औपनिवेशिक बिहार में शिक्षक : एक बानगी

‘बेचारे प्राइमरी स्कूल के शिक्षक, जो रात-दिन छोटे-छोटे बच्चों को लेकर रटाते रहते हैं और उन्हें पढ़ने योग्य बनाते हैं। लेकिन उन्हें केवल दस रुपया मासिक मिलते हैं। कितने गुरुओं को मैंने तीन-तीन रुपए में जिंदगी खत्म करते देखा है।...बेचारे उन गुरुओं और किसानों की एक ही हालत है। ये दोनों राष्ट्र के निर्माता ठहरे, पर इनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। फिर क्यों नहीं देश रसातल में जाए ? ...लेकिन समझ में नहीं आता कि गुरुजी के साथ ऐसी बेरहमी क्यों की जाती है, जो शिक्षा की जड़ हैं और जिन पर राष्ट्र की उन्नति बहुत कुछ निर्भर करती है ?' (देखें, त्रिवेणी संघ का बिगुल , और देखें,
पी. के. चैधरी व श्रीकांत , बिहार में सामाजिक परिवर्तन के दस्तावेज, विद्या विहार, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण: 2010, पृष्ठ 173).
गुरुजी की मुख्य आमदनी चटियों के महीने से थी, लेकिन इसकी गारंटी भी क्या थी ? ‘कभी-कभी किसी लड़के का बाप आकर कहने लगता था-गुरुजी, इस साल पैदा बहुत नरम है। भदई और अगहनी ने कमर तोड़ दी। चैती का भरोसा है। खेत कमाते-कमाते तो पीठ की रीढ़ धनुही हो गई, मगर करम गवाही नहीं देता तो क्या करूँ ? और कोई धंधा भी तो नहीं है! आप तो घर के आदमी हैं, हालत देखते ही हैं। आपसे क्या परदा है ? आप तो सब रत्ती-रत्ती जानते हैं। मगर चैत में सब बाकी बेबाक कर दूँगा। दाम-दाम जोड़कर ले लीजिएगा। भगवान की दया से क्या हरदम सूखा ही पड़ेगा ? अपने ऊपर चाहे लाख बीते, मगर मैं किसी का खदुक रहना नहीं चाहता। किसी का मेरे यहाँ कौड़ी का एक दाँत भी बाकी नहीं है। पेट काटकर तो मालिक की कौड़ी देता हूँ। आपकी दया से यह लड़का अगर कुछ पढ़ जायगा, तो मेरा दुख छूट जायगा। आपका नाम लेता रहूँगा। आपकी एक निसानी रह जायगी। मेरे यहाँ आपका नकद डेढ़ रुपया और साढ़े बारह सेर सीधा बाकी है। कहीं पुरजे पर टाँक लीजिए।’ ( देहाती दुनिया से , शिवपूजन रचनावली, खण्ड 1, पृष्ठ 134-35)। अक्सर यह कागज पर टंका ही रह जाता।
गुरुजी की आमदनी ‘शनिचरा’ से भी होती। ‘प्रत्येक शनिवार को अक्षत और तिल से लड़के गणेश जी की पूजा करते, उन पर पैसे चढ़ाते। यह पैसा गुरुजी का होता।’ (किशोरी प्रसन्न सिंह , राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण, फरवरी 2002, पृष्ठ 50) लेकिन यह सौभाग्य अक्सर सोया ही रहता, क्योंकि ‘बहुत-से लड़के ऐसे थे, जो कभी चावल लाते थे तो गुड़ और पैसा नहीं, कभी पैसा तो चावल और गुड़ नहीं, कभी गुड़ तो चावल और पैसा नहीं। उनके यहां गुरुजी का दरमाहा और सीधा भी बाकी पड़ा रहता था।' (देहाती दुनिया से, शिवपूजन रचनावली, खण्ड 1, पृष्ठ 134-35). ये और बात है कि संपन्न घरों के कुछ बच्चे कभी फेल नहीं करते, ‘बल्कि किसी-किसी दिन एक पैसे के बदले गणेश जी पर दो पैसे चढ़ाते। गुरुजी हमारी (किशोरी प्रसन्न सिंह) या चन्द्रदेव (किशोरी जी के सहपाठी-मित्र) की भक्ति से बहुत प्रसन्न होते। गुरुजी हमलोगों का अधिक ख्याल रखते, इन्हीं कारणों से क्योंकि हमलोग सुसंपन्न घर के थे।’ (राह की खोज में, पृष्ठ 51)
अब पेट-पूजा का ही एकमात्र आसरा होता-‘गुरुजी भांज लगाकर पारी-पारी से अपने विद्यार्थियों के घर खाते थे, जो परिवार में बनता था, वही उनको भी मिलता था। बहुत परिवार ऐसे भी थे जहां वह नहीं खाते क्योंकि ऐसे परिवार खिला ही नहीं सकते। हमारे घर में गुरुजी के लिए अच्छा भोजन भी बनता और पारी भी जल्दी-जल्दी पड़ती।’ (किशोरी प्रसन्न सिंह , राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण, फरवरी 2002, पृष्ठ 50).
‘मैं गुरुजी की शिकायत नहीं कर रहा हूं। बचपन में जो देखा और भोगा है, उसे ही लिख रहा हूं।’ (वही, पृष्ठ 51) जिन्हें
किशोरी जी की इस ‘शिकायत’ पर विश्वास नहीं है वे जनकवि नागार्जुन की कविता ‘प्रेत का बयान’ देखें-
‘ओ रे प्रेत-’’
कड़क कर बोले नरक के मालिक यमराज
-‘‘सच सच बतला!’’
कैसे मरा तू ?
भूख से, अकाल से ?
बुखार कालाजार से ?
पेचिस बदहजमी, प्लेग महामारी से ?
कैसे मरा तू, सच सच बतला!’’
खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़
काँपा कुछ हाड़ो का मानवीय ढाँचा
नचाकर लम्बी चमचों-सा पंचगुरा हाथ
रूखी-पतली किट-किट आवाज में
प्रेत ने जबाव दिया-
‘‘महाराज !
सच सच कहूँगा
झूठ नहीं बोलूँगा
नागरिक हैं हम स्वाधीन भारत के....
पूर्णिया जिला है, सूबा बिहार के सीवान पर
थाना धमदाहा, बस्ती रूपउली
जाति का कायथ
उमर है लगभग पचपन साल की
पेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था
तनखा थी तीस, सो भी नहीं मिली
मुश्किल से काटे हैं
एक नहीं, दो नहीं, नौ नौ महीने !
घरनी थी, माँ थी, बच्चे थे चार
आ चुके हैं वे भी दया सागर करुणा के अवतार
आपकी ही छाया में !
मैं ही था बाकी
क्योंकि करमी की पत्तियाँ अभी कुछ शेष थीं
हमारे अपने पुस्तैनी पोखर में
मनोबल शेष था, सूखे शरीर में....’’
‘‘अरे वाह-’’
भभाकर हँस पड़ा नरक का राजा
दमक उठीं झालरें कम्पमान सिर के मुकुट थी
फर्श पर ठोककर सुनहला लौह दण्ड
अविश्वास की हँसी हँसा दंडपाणि महाकाल
‘‘-बड़े अच्छे मास्टर हो:
आये हो मुझको भी पढ़ाने !!
मैं भी तो बच्चा हूँ ....
वाह भाई वाह !
तो तुम भूख से नहीं मरे ?’’
हद से ज्यादा डालकर जोर
होकर कठोर
प्रेत फिर बोला
‘‘अचरज की बात है
यकीन नहीं आता है मेरी बात पर आपको ?
कीजिए न कीजिए आप चाहे विश्वास
साक्षी है धरती, साक्षी है आकाश
और और और भले व्याधियाँ हों भारत में ..किन्तु..’’
उठाकर दोनों बाँह
किट किट करने लगा जोरों से प्रेत
-‘‘किंतु भूख या क्षुधा नाम हो जिसका
ऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको
सावधान महाराज
नाम नहीं लीजिएगा
हमारे सामने फिर कभी भूख का ’’
निकल गया भाफ आवेग का
शांत स्तिमित स्वर में प्रेत फिर बोला-
‘‘ जहाँ तक मेरी अपनी बात है
तनिक भी पीर नहीं
दुख नहीं, दुविधा नहीं
सरलता पूर्वक निकले थे प्राण
सह नहीं सकी आंत जब पेचिश का हमला ....
सुनकर दहाड़
स्वाधीन भारतीय प्राइमरी स्कूल के
भुखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षित प्रेत की
रह गये निरुत्तर
महामहिम नरकेश्वर ! !

Saturday, 10 December 2016

सेंट बोरिस के पढ़े हैं हम|. By Dr Raju Ranjan Prasad Must Read!!!

DrRaju Ranjan Prasad Sir is History Teacher and Independent Writer.
His Facebook's Bio stateयह भी पूछने की बात है ? आदमी हूँ !




सेंट बोरिस के पढ़े हैं हम
पब्लिक स्कूल में पढ़ाने के क्रम में कुछ आत्मीय शिष्य अक्सर पूछते : 'सर, आप किस स्कूल में पढ़े हैं' और हम आत्मरक्षार्थ मौन लगा जाते। बच्चे कयास लगाते। सर फलां स्कूल में पढ़े होंगे। दूसरे इसे काटते और कहते, नहीं, सर फलां स्कूल में पढ़े होंगे। हम मन ही मन मुस्कुराते। कभी-कभी यह मुस्कराहट हमारे मुखमंडल पर प्रकट हो जाती और बच्चे इसका राज जानना चाहते। हम सोचते कि कितने भोले हैं हमारे बच्चे और दुखी होते। जब दुःख असह्य होने लगता तो बताते कि 'सेंट बोरिस स्कूल के विद्यार्थी रहे हैं।' बच्चों के सामान्य ज्ञान में ऐसे किसी स्कूल का नाम न होता। वे पूछते, 'सर, ऐसे किसी स्कूल के बारे में तो हमलोगों ने अबतक नहीं सुना। कहाँ है वह स्कूल जो ऐसे शिक्षकों को पैदा कर गया?' 'मैं जूट की बोरी वाले स्कूल की पैदाईश हूँ। बोरी से स्कूल का नाम हुआ बोरिस।'

Sunday, 4 December 2016

Who I am : It's a story of everything I've been through. Story 3. Must Read Published by DODDER As Your Writing Partner!!

This Story is being Written by Arpit in form of personal essay with Reader.


Who I am :it's a story of everything I've been through.

A new idea!!

By Arpit

Few day back a idea comes to me, why not to create something which could fit into reality of making change.
Then my mind went back to listen my friend Prashant's word who spoke to me before I took transfer certificate.

He said that Arpit!! Why should  you go for Journalism as career. He further added you have better chance to  come out with brand name.

Honestly I never given second thought to his word until this idea strike in my mind. Prashant has always helped me whenever I felt problem in my subjects. He continues to have a share in my heart.
I love thinking, finding, researching , complying and writing. But I never Written bunch of article and got Published. I wrote when my own friends asked me. Fact is they all appreciated those writing.

Ok leave it…
Now idea was about School of Journalism.
You may ask, what new in it as these courses already exists?
Read Next you may find it a new idea!
*From high school students to college men with true spirit in Humanities.
*My Mentors
*Training all day
*A Balanced citizen
* Honest politician
*Truthful official
This will be Vocational training which will give practical experience to became man.

You may refuse these things cannot be made into reality or people don't believe in it.
These  thing are challenge for my team.

My Question if you say it exists at other places. I refuse to except as lot many cases I read through newspaper.
No body want to join politics or people losing faith in their representative. Why?
Case came about official not listening to public?

These people has also got training but lost their fundamental value over time.
My Graduates would be reflective Personality where ever they will go they will speak candidly and making better tomorrow.

Experts believe learnability of alternate skill at school stage is far higher and students will learn more at this stage.

They will may be unique in another reason that is they took Journalism not Activism to groom their personality and to become better individual.

-Arpit