Saturday, 3 December 2016

मैं जो रह गया हूँ यशोधरे (कविता) संजय कुमार शांडिल्य की कलम से।। Published by DODDER

संजय कुमार शांडिल्य सर अभी सैनिक स्कूल गोपालगंज में शिक्षक हैं।
हाल में हि आया उनका  किताब

“आवाज़ भी देह है”  



मैं जो रह गया हूँ यशोधरे कविता उसी की है
दिसम्बर की मुरमुरी देह के साथ
जो गुजर गया उसका स्पर्श है
त्वचा में
हवा में हवा सी बहती सारंगी है
इस पल के पार
कविता तो बंधन की कविता है यशोधरे
जो चला जाएगा वह मोक्ष का होगा
जो चला जाएगा वह राष्ट्र का होगा
मैं इस दिसंबर की मुरमुरी देह के साथ बचा रहुँगा तुम्हारा
मैं वर्ष दर वर्ष लिखुँगा एक अंतिम कविता
दुख और मोह की
प्रेम और आसक्ति की
रोग और शोक की
और तुम्हारे साथ छूट जाऊँगा
मैं तुम्हारे निविड़ अकेलेपन में बजुंगा जलतरंग बनकर
जा रहा वर्ष योगी है लोटेगा तीन सौ चौसठ दिवसों के अनंतर
मैं मलंग तुम्हारे साथ-साथ रहुँगा धड़कता-फड़कता
तुम्हारे ज्वर में तुभ्हारे भाल पर बर्फ की पट्टी
मैं नहीं जानता कि नये-नूतन वर्ष में इस अंतिम कविता का क्या होगा अनन्ये
मेघ-मालाएँ गरजेंगी -बरसेंगी
धूप उधियाएगी उड़ेगी
फूल खिलेंगे मुरझाएँगे
फिर मैं इसके बारे में ज्यादा नहीं सोचुंगा
दर्शन को शेष रह जाने की चिन्ता हो
शास्त्र बचे रहने को मरे खपें
मोक्ष और अमरता का संधान ऋषिमुनि करें
कविता तो होठों पर बरसेगी
बहेगी कुछ देर धारा बनकर
रेगिस्तान की नदी लुप्त हो जाएगी रेगिस्तान में ।

संजय कुमार शांडिल्य

2 comments:

  1. Thanks Shubham
    For your word of Appreciation our Distinguished Poet Mr SK Shandilya Sir

    Stay tune with DODDER for more poem of Mr Shandilya Sir

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