Thursday, 15 December 2016

कदम जो डगमगाते हैं संभल भी जाते हैं।(कविता) संजय कुमार शांडिल्य कि कलम से।



संजय कुमार शांडिल्य सर अभी सैनिक स्कूल गोपालगंज में शिक्षक हैं।
हाल में हि आया उनका  किताब प्रकाशित हुआ है।

“आवाज़ भी देह है”  



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1.
कश्ती है तलातुम में कोई नाख़ुदा नहीं
मुझको यकीन हो न हो कोई ख़ुदा नहीं
मैं चाहता हूँ ज़ज्ब हो मुझमें तमाम रात
अब सुब्ह पर हमारा कोई मर्तबा नहीं
वो मेरा कुछ नहीं है जो कहता है रातदिन
वो है वफ़ा का देवता, वो बेवफ़ा नहीं
बस लौटती है मेरी ही आवाज़ ए बेबसी
जो आहटें हैं चीख है कोई सदा नहीं
बुलबुल क़फस क़फस है कोई आशियाँ नहीं
तुम अब हो जिस मुकाम पर वो गुलसिताँ नहीं।

संजय

2.
कदम जो डगमगाते हैं संभल भी जाते हैं
ऊबने वाले सुनो हो बहल भी जाते हैं ।
जो रंग खूब जमी महफिलें सजाते हैं
दो बूंद आब पड़े तो बदल भी जाते हैं ।
जो खैंक गड़ते हैं ऊँगली की पोर में बारहा
जरा सी सूई से पल में निकल भी जाते हैं ।
अभी तो ताज़ा है ये ज़ख्म इसका मरहम है
फ़ानी ए वक्त में ज़खमेकुहन भी जाते हैं ।
संजय


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