संजय कुमार शांडिल्य सर अभी सैनिक स्कूल गोपालगंज में शिक्षक हैं।
हाल में हि आया उनका किताब
“आवाज़ भी देह है” ।
पेश हैं उनके कलम से यह कविता।
फर्क आदमी और हॉजपाइप में
जो चीजें हैं और जो उसकी समझ है
वह अलग-अलग मामला है
यही जो फोटो खींचता जा रहा है बच्चे के छठे
जन्मदिन पर सोनी का कैमरा
समन्दर के लहरों की तरह साफ तस्वीरें
उसमें कहाँ आती है वह स्लेट जिसपर
दादी रोज अपनी उमर मिटाती है
और आशीषें बङी करती है
और यह हॉजपाइप बेकार पङा समुद्री बेङे का
और यही पच्चीस वर्ष पुराना समुद्री बेङा
अगर युद्ध हार और जीत के बीच फँसी हो
आज की रात
कल सुबह निकलना हो लाम पर क्या कहेगा कप्तान
बारह घंटे कम नहीं होते हार को जीत में बदलने में
गरचे हम यही जीवन भर नहीं समझ पाते और बङी तैयारियों में मामूली होते जाते हैं
सबसे पहले उस हॉजपाइप को दुरुस्त करने कहेगा कप्तान
जो बरसों से पङा है उपेक्षित नित नये होते उपस्करों की भीड़ में
नुकसान कम करना भी दरअसल युद्ध जीतना है
एक उपेक्षित हॉजपाइप फेंक कर मिलीयन लीटर पानी पोत को वापिस तट तक ला सकता है
एक पुराने हॉजपाइप से हारा हुआ युद्ध जीता जा सकता है
आदमी और हॉजपाइप में बहुत फर्क होता है तबभी
जब सिर्फ चीजों से समझ बन-बिगड़ रही है आजकल ।
संजय कुमार शांडिल्य

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