संजय कुमार शांडिल्य एक कवि के साथ एक अच्छे शिक्षक भी हैं। जरूर पढे उनकी कविता संग्रह " अवाज भी देह हैं।"
राम अकेला है।
रावण के परिजन-पुरजन हैं राम अकेला है
उलझन रहित उधर रावण की युद्ध-पिपासा है
इधर झमेले बहुत , पराजय और निराशा है
पतलूनों की फटी जेब में नहीं अधेला है
सोने की लंका में युद्ध अवसर है उत्सव का
इधर अभाव-अवध हेतू है रोज पराभव का
उधर शाम की छाँव,दिवस का इधर घमेला है
वरदानों का रावण मद में चूर विलासी है
विवश राम बैठा पूजन शक्ति अभिलाषी है
पोर-पोर में गाँठ धनुष का, पग-पग ठेला है।
संजय कुमार शांडिल्य
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