Wednesday, 30 November 2016

सतपुड़ा के पहाड़ - संजय कुमार शांडिल्य (कविता )



संजय कुमार शांडिल्य सर अभी स्कुल के बच्चोंं के साथ शैक्षणक भ्रमण पर पंचमढीं में हैं। 


सतपुड़ा के पहाड़
चढ़ाई में हाँफते बहुत हैं
उतराई में फिसलते बहुत हैं
घुटनों से लाचार
सतपुड़ा के बूढ़े पहाड़ हैं
अनुभवी हैं,फूले हुए हैं
सुलझाते हैं करोड़ो साल के
उलझे जीवन के ताने-बाने
तने हैं जैसे तना रहता है धनुष
जैसे झुका-झुका सा
पकी उम्र का स्वाभिमान
मही की अतीत की महानता
जागती है
इनके सोये-सोये कंधों पर
झूलती हुई घाटियाँ
जैसे जाँघ की पेशियाँ हैं
बचे-खुचे हैं
सख्त हैं
इकहरी इनकी देह में
टूटती-उखड़ती
चट्टानों की
झरती-बिखरती हड्डियाँ हैं
गूँजता है इनका आँगन
मधुमख्खियों से भरा हुआ
इन बूढ़े पहाड़ों की
शहद से मीठी पोतियाँ हैं
सर्रू के पेड़ो से लिपटकर
खिलती हैं वौगनबेलिया
जैसे विराट दुख खिलते हैं
ढलती उम्र में
जीवन के पहाड़ों के
थाम लेते हैं हम बेटों की तरह
कुछ कहे बिना
कंधों से सतपुड़ा के पहाड़ों को
लौटते हुए भर आती हैं आँखें
हम इनके साथ रहे भी
तो कितना रहेंगे
जानते हैं सतपुड़ा के पहाड़
हमारी पीठ देखते हैं
और हमारे लौट जाने के बाद
हमारा नाम पुकारते हैं
सतपुड़ा के पहाड़ ।

संजय कुमार शांडिल्य

Picture taken by Ujjwal kumar

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