चलो कोई कविता पढ़ते हैं
सूने कदमों का जीवन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ,
चारोसू घनघोर विजन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ।
रचे हुए में कुछ तो जीवन जैसा रचा हुआ हो
शायद मन का चाहा बंधन-मुक्ति बचा हुआ हो
इधर व्यर्थ का सिंधु-महन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ।
कोई तो कपास सा हल्का स्वप्न देखता होगा
कोई तो लिखता होगा सच जीवन जीया-भोगा
थका हुआ जगमग जूठन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ।
कहीं तो हाँडी की खुरचन सा सोंधा स्वाद मिलेगा
कहीं तो राम करे सब मंगल हो संवाद मिलेगा
जिसमें अपना घर-आँगन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ।
संजय कुमार शांडिल्य
सूने कदमों का जीवन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ,
चारोसू घनघोर विजन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ।
रचे हुए में कुछ तो जीवन जैसा रचा हुआ हो
शायद मन का चाहा बंधन-मुक्ति बचा हुआ हो
इधर व्यर्थ का सिंधु-महन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ।
कोई तो कपास सा हल्का स्वप्न देखता होगा
कोई तो लिखता होगा सच जीवन जीया-भोगा
थका हुआ जगमग जूठन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ।
कहीं तो हाँडी की खुरचन सा सोंधा स्वाद मिलेगा
कहीं तो राम करे सब मंगल हो संवाद मिलेगा
जिसमें अपना घर-आँगन है,चलो कोई कविता पढ़ते हैं ।
संजय कुमार शांडिल्य

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