Thanks #_Sanjay_Kumar_Shandilya_Sir for sharing beautiful poem.
#_TeamDodder always learn the things which we can see but doesn't feel.
तैरती हुई बत्तखों का गीत
तैरती हुई बत्तखों का गीत
कविता में मैं धीरे-धीरे समझता हूँ
घट रहे को
तेज है,बहुत तेज घटना
जैसे आसपास सबकुछ अनघटा हो
वापिस करना और चीजों को
मंथर गति से चलाकर देखना
नदी के पानी को पीने से पहले
गमछे से छानने जैसा
मजूर के होंठ मुजफ्फरपुर में
बिचलते हैं
और उसका दर्द समस्तीपुर में
समझ आता है
कमाने जा रहे किसान की आँख
पूर्णिया में लाल होती है
उसका गाल लुधियाना, अमृतसर में
गीला होता है
कैरो में फसल नहीं आती किसी साल
तो लंदन में सिहरता है अफ्रीका
लौटता हूँ तो तैरती हुई बत्तखों की
आँखों से झील देख पाता हूँ
लिखना वैसे ही है लौटकर बहुत
देर बाद लिखना
खिला हुआ बुरांश और लाल
और खिला हुआ
पहाड़ों से उतरते हुए जैसे दिखा
पहाड़
वहाँ होते हुए नहीं दिखाई पड़ता है
तुम चाहते हो चल रहे पर्दे पर
झूठी रौशनी में
मैं कोई बात कह दूँ
जिसे तुम मेरे खिलाफ दिन भर
इस्तेमाल करो
माना कि यह चमकीली और भव्य
स्टुडियो जैसी दुनिया तुम्हारी है
तुम इसके मालिक हो
मैं यहाँ देर तक बोलने से पहले
बैठ कर सोच नहीं सकता हूँ
माना कि मेरे लिए अब
कहीं किसी स्टेशन पर
कोई वेटिंगरूम नहीं है
मैं चलती हुई ट्रेन के आगे छलांग
नहीं मारूंगा
जैसे शिथिल पंखो की उष्मा से
अंडों से बाहर झाँकती है नई बत्तख
मैं कविताएँ आत्महत्या के विरुद्ध
जीवन के पक्ष में लिखता हूँ ।
संजय कुमार शांडिल्य
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