क्या मैं निर्देशों की तरह
साफ और छोटी लिख सकता हूँ कविता?
शत्रु कितनी दूर हरकत कर रहा है
यह आज मुझे मालूम नहीं
कितना बड़ा या किस आकार का है
यह जान लेना आसान नहीं है
किस शिल्प से ,कौन सा छंद
लक्ष्य यह कैसे भेद सकेगी
किस लोहे में,किस शीशे में भरूँ
ओज,तम छेद सकेगी
कोई तो कहो मैं कैसे लडूँ कि
सचमुच लड़ता दिख सकता हूँ
किस विचार से लैस करूँ मैं
अपने सुर की ध्वनियाँ
किस पहाड़ के पीछे दुश्मन ने
डाली छावनियाँ
कब हमलावर होऊँ,कितने पास उसे
आने दूँ
पीछा करूँ या मारूँ भीतर घुसकर
जिससे लड़ता रहा जीवन भर
क्या हो जाऊँ उस जैसा मैं
पहन उसी का बख्तर
सीने पर गोली दागूँ या पीठ में भोकूँ खंजर
नीति-अनीति के बीच खड़ा हूँ चारो ओर समंदर
हथियारों की तरह तेज हो
घन-गर्जन सा मंथर
शब्द-मंत्र मैं बाँधूँ
बाजू दो
बाँध सकूँ मैं जंतर
साफ-साफ मैं दिखूँ अरि को अरि सा
और नहीं कुछ
बाधाओं को मार न पाऊँ
द्वन्द पराजित हो नहीं पाएँ
ठीक किले के दरवाजे पर
अपने हरसिंगार से सपनों
के खातिर मर तो सकता हूँ
सब अदृश्य है तो ऐसे में
किसी दृश्य सा मैं
चाहूँ दिखना तो
दिखने दोगे ?
साफ और छोटी लिख सकता हूँ कविता?
शत्रु कितनी दूर हरकत कर रहा है
यह आज मुझे मालूम नहीं
कितना बड़ा या किस आकार का है
यह जान लेना आसान नहीं है
किस शिल्प से ,कौन सा छंद
लक्ष्य यह कैसे भेद सकेगी
किस लोहे में,किस शीशे में भरूँ
ओज,तम छेद सकेगी
कोई तो कहो मैं कैसे लडूँ कि
सचमुच लड़ता दिख सकता हूँ
किस विचार से लैस करूँ मैं
अपने सुर की ध्वनियाँ
किस पहाड़ के पीछे दुश्मन ने
डाली छावनियाँ
कब हमलावर होऊँ,कितने पास उसे
आने दूँ
पीछा करूँ या मारूँ भीतर घुसकर
जिससे लड़ता रहा जीवन भर
क्या हो जाऊँ उस जैसा मैं
पहन उसी का बख्तर
सीने पर गोली दागूँ या पीठ में भोकूँ खंजर
नीति-अनीति के बीच खड़ा हूँ चारो ओर समंदर
हथियारों की तरह तेज हो
घन-गर्जन सा मंथर
शब्द-मंत्र मैं बाँधूँ
बाजू दो
बाँध सकूँ मैं जंतर
साफ-साफ मैं दिखूँ अरि को अरि सा
और नहीं कुछ
बाधाओं को मार न पाऊँ
द्वन्द पराजित हो नहीं पाएँ
ठीक किले के दरवाजे पर
अपने हरसिंगार से सपनों
के खातिर मर तो सकता हूँ
सब अदृश्य है तो ऐसे में
किसी दृश्य सा मैं
चाहूँ दिखना तो
दिखने दोगे ?
संजय कुमार शांडिल्य
No comments:
Post a Comment